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लिखी गई भोजपुरी फिल्मों के बदलाव की कहानी

भोजपुरी बेहद मीठी भाषा है. देश के बड़े बड़े साहित्यकारों और क्रांतिकारियों की भाषा है, लेकिन ऎसी महान भाषा का सिनेमा इतनी बुरी हालत में है ये सोचकर भी शर्म आती है. यह कहना था हिन्दी फिल्मों के प्रख्यात लेखक कमलेश पांडे का. वह स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम “भोजपुरी सिनेमा : कल, आज और कल” में बतौर अतिथि बोल रहे थे. कमलेश पांडे खुद भी भोजपुरी भाषी हैं.

अंधेरी पश्चिम के भक्तिवेदांत स्कूल ऑडिटोरियम में आयोजित प्रोग्राम में भोजपुरी सिनेमा के मौजूदा हालात और भविष्य की संभावनाओं को लेकर स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन ने चर्चा आयोजित की थी. चर्चा दो सत्रों में हुई. पहले सत्र में भोजपुरी फिल्मों की स्क्रिप्ट को लेकर बात हुई, जबकि दूसरे सत्र में भोजपुरी फिल्मों के गीतों पर बहस हुई.

पहले सत्र में लेखक जीतेन्द्र सुमन, निर्माता – वितरक अभय सिन्हा, अभिनेता कुणाल सिंह, अभिनेत्री स्वीटी छाबड़ा और लेखक-निर्देशक मंजुल ठाकुर पैनलिस्ट थे. जबकि मॉडरेटर थे भोजपुरी फिल्मों के लेखक धनंजय कुमार. इस सत्र में भोजपुरी फिल्मों की स्क्रिप्ट की कमजोरी पर बात हुई. निर्देशक मंजुल ठाकुर ने जहाँ अच्छे स्क्रिप्ट राइटर के न होने की बात उठाई, वहीं राइटर जीतेन्द्र सुमन का कहना था कि अच्छे स्क्रिप्ट राइटर्स तक लोग पहुँचते ही नहीं, क्योंकि उन्हें कम पैसे में राइटर चाहिए. जबकि निर्माता अभय सिन्हा का कहना था कि राइटर्स को हमने पाँच पाँच लाख तक पेमेंट किया है, लेकिन अच्छी भोजपुरी फिल्में चल नहीं पातीं. तो अभिनेता कुणाल सिंह और हीरोइन स्वीटी छाबड़ा का कहना था कि राइटर के यहाँ से चली स्क्रिप्ट सेट पर आर्टिस्ट तक आते आते काफी बदल जाती है.

कई भोजपुरी फिल्मों में हीरोइन रहीं स्वीटी छाबड़ा ने यह बी स्वीकार किया कि भोजपुरी फिल्मों की हीरोइन के तौर पर खुद का परिचय देते वक्त परिवारों में कई बार झेंप सी होती है. वहीं अभय सिन्हा ने कहा कि जो रेगुलर प्रोड्यूसर फिल्में बना रहे हैं, उनकी फिल्मों में फूहड़ता नहीं होती, लेकिन ढेर सारे नये प्रोड्यूसर भी फिल्में बनाने आते हैं, उनकी फिल्मों की वजह से हम सब भी बदनाम हो जाते हैं. इस सत्र की पूरी चर्चा में यह बात उभर कर आई प्रोड्यूसर्स चूँकि स्क्रिप्ट राइटर पर अपने बजट से नहीं के बराबर राशि खर्च करना चाहते हैं, इसलिए अच्छे स्किल्ड स्क्रिप्टराइटर भोजपुरी फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट नहीं लिखते, इसलिए स्तरीय और अच्छी फिल्में नहीं बन पातीं.

दूसरे सत्र में गीतों को लेकर चर्चा हुई. इस सत्र में पैनलिस्ट के तौर पर गीतकार समीर, लोकगीत गायिका शैलेश श्रीवास्तव, निर्देशक सुनील प्रसाद, राजकुमार पांडे, वर्ल्ड वाइड रिकॉर्ड्स के मालिक रत्नाकर और उत्तरप्रदेश फिल्म विकास परिषद के वाइस प्रेसिडेंट गौरव द्विवेदी शामिल हुए. मॉडरेटर थे धनंजय कुमार.

इस सत्र में राजकुमार पांडे और म्यूजिक कम्पनी मालिक को जहाँ डबल मीनिंग गानों के लिए कटघरे में खड़ा किया गया, वहीं समीर ने कहा कि अब यह दौर भी अपने आखिरी चरण में हैं. जितनी नंगई भोजपुरी फिल्मों में है, उसके आगे अब कोई शब्द नहीं बचे. अगर यह ट्रेंड नहीं बदला तो भोजपुरी फिल्में एक बार फिर बंद होने की स्थिति में पहुँच जायेंगी. सुनील प्रसाद और शैलेश श्रीवास्तव ने भोजपुरी लोकगीतों की मिठास और पुरानी फिल्मों के गानों की कर्णप्रियता को याद किया तो, रत्नाकर का कहना था बुरे गानों का दौर खात्मे की ओर है और वह अपनी कम्पनी से ऎसे गाने रिलीज नहीं करते. अभिनेत्री स्वीटी छाबड़ा का कहना था कि उन्होंने कभी वल्गर गानों पर काम करना स्वीकार नहीं किया. इस स्थिति से उबरने में उत्तरप्रदेश फिल्म विकास किस तरह अपनी सकारात्मक भूमिका निभा सकता है, इस पर अपनी बात रखते हुए वाइस प्रेसिडेंट ने कहा कि अच्छी फिल्म बने इसके लिए उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद वचनबद्ध है और हम हर सम्भव मदद को तैयार हैं.

प्रोग्राम की शुरुआत स्क्रीनराइटर्स एसोसिएशन द्वारा भोजपुरी फिल्मों के अबतक के सफर पर बनाई गई डॉक्यूमेंटरी फिल्म के प्रदर्शन से हुई. डॉक्यूमेंटरी फिल्म की संकल्पना और स्क्रिप्ट धनंजय कुमार की थी, जबकि निर्देशन किया था सुनील प्रसाद ने.

उसके बाद एसोसिएशन के महासचिव जमा हबीब ने राइटर्स एसोसिएशन कद्वार इस तरह के प्रोग्राम के पीछे के मकसद को सामने रखा और भोजपुरी फिल्मों गानों से जुड़ी अपनी पसंद – नापसंद की चर्चा की.

महासचिव वक्तव्य के बाद एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट और इवेंट सब कमिटी के चेयरमैन दानिश जावेद ने आज के कार्यक्रम के बारे में संक्षिप्त परिचय दिया. प्रोग्राम के उद्घोषक थे सुधाकर स्नेह. इस अवसर पर हिन्दी के प्रख्यात लेखक अंजुम रजाबली, विनय शुक्ला, जलीस शरवानी, टेलीविजन सीरियल लेखक राजेश दुबे, सुनील साल्गिया, शांति भूषण, और मनोज हंसराज, के मनोज सिंह, अमित झा सहित ढाई सौ से अधिक भोजपुरी सिनेमा से जुड़े लेखक निर्देशक और भोजपुरी भाषा प्रेमी उपस्थित थे.

नालंदा, बिहार के रहने वाले धनंजय कुमार पेशे से फिल्मकार हैं। वे मुंबई में रहते हैं। 

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