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वशिष्ठ के परामर्श पर श्रीराम ने किया शम्बूक वध

डॉ० चतुर्भुज की स्मृति में आयोजित 9वीं अखिल भारतीय ऐतिहासिक नाट्य महोत्सव 2018 के चौथे दिन 20 फरवरी 2018 को अभियान सांस्कृतिक मंच के दल ने बृजेश द्वारा लिखित और राजू कुमार द्वारा निर्देशित नाटक शम्बूक वध का मंचन किया.

नाटक अपने सारगर्भित कथ्य और कलाकारों के दमदार अभिनय से दर्शकों को लगभग डेढ़ घंटे से ज्यादे समय तक बांधे रखा. दर्शक न सिर्फ हास्य दृश्य पर हंसते, और दमदार अभिनय एवं संवाद पर ताली पीटते रहे बल्कि कथा को नए दृष्टिकोण के साथ देखते, समझते और विचारते भी रहे.

नाटक ऐतिहासिक व पौराणिक कथा के लिहाज से महत्वपूर्ण है. सर्वप्रथम नाटक शम्बूक वध के पृष्ठभूमि को चित्रित करने की कोशिश करता है. इसी क्रम में यह स्पष्ट होता है कि जब चौदह वर्षों के वनबास के बाद श्रीराम अयोध्या लौटते हैं तो सत्ता संचालन के लिए वे क्या-क्या कदम उठाते हैं? सबों की सुख-शांति के लिए किस प्रकार की राज्यव्यवस्था करते हैं? सबों को एक साथ समेटने के लिए किस तरह निषादराज और शबरी की कहानी को प्रचारित किया जाता है? किस प्रकार से चातुर्य वर्णव्यवस्था के कट्टर समर्थक अपनी असहजता के बीच छटपटाते रहते हैं और किस-किस तरह की साजिश रचते रहते हैं?

एक तरफ राज्य में शूद्रों के लिए विद्यालय, जलाशय और कहवाघर खोलने की बातें होती हैं तो दूसरी तरफ छुआछूत का प्रपंच भी बदस्तूर जारी रहता है. राज्य के भद्र लोग, वणिक आदि ही नहीं बल्कि आलाअधिकारी सुशर्मा और गुरू वशिष्ठ की भवें भी इस व्यवस्था से तनी रहती हैं. जबकि गुरू वशिष्ठ की पत्नी देवी अरुंधती भी शूद्र, अन्त्यज रहती है. फिर भी वे वर्ण सामंजस्य और वर्णभेद की महीन रेखा के बीच अर्थ तलाशते नज़र आते हैं.

ये लोग अपने स्वार्थसिद्धि के लिए श्रीराम को भी इस्तेमाल करते रहते हैं. राज्य-प्रशासन के लिए नियम-उपनियम और शास्त्र की बात कर श्रीराम को गुमराह करते रहते हैं. शूद्रों को ही नियंत्रित करने की कोशिश ये लोग नहीं करते हैं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं शासन करने की भी कोशिश करते रहते हैं. गुरू वशिष्ठ पूरे वर्ण व्यवस्था पर नियंत्रण रखने के लिए व्रत जैसे पात्रों का भी इस्तेमाल करते हैं जो शम्बूक और उनके बीच एक कड़ी के रूप में भी काम करता है. व्रत गुरू वशिष्ठ के परामर्श पर प्रलोभन देकर शम्बूक को अपने पथ से विचलित कर अपने पक्ष में कर राम को सबल करने की असफल कोशिश भी करता है.

नाटक में धोबनें, पुक्कस और सिपाही हैं तो भट्टारक भी हैं. बढ़ई वृदु कलिंग के राजपुरोहित की बेटी वलया से भागकर अंतरजातीय विवाह करता है तो गोत्रविहीन सत्यकाम जाबाला भी महर्षि गौतम से मिले जनेऊ के धागे के बीच छटपटा रहा है लेकिन मानवीय हानि को देखते हुए शूद्रों के सामूहिक वेदपाठ का विरोध करता है. वह सीधी लड़ाई की बात करता है.

लेकिन विषम परिस्थिति में वशिष्ठ आदि के परामर्श पर श्रीराम शम्बूक का वध कर देते हैं. नाटक में कथा को एक नए दृष्टिकोण से दिखाने की कोशिश की गई है. जिस तरह नाटक में श्रीराम अप्रस्तुत होकर भी प्रस्तुत हैं वैसे ही संवादों के माध्यम से बहुत सारे सारगर्भित प्रश्नों व विचारों को प्रक्षेपित करने की भी कोशिश की गई है.

राजू कुमार निर्देशित इस नाटक में गौतम गुलाल (शम्बूक), अनीश अंकुर (सुशर्मा), जय प्रकाश (सत्यकाम), आशुतोष कुमार (वशिष्ठ), सुशील कुमार भारद्वाज (वीरावर्मन), आदर्श रंजन (धनगुप्त), संजय कुमार सिंह (भट्टारक, विरोचन), राजू कुमार (वृदु), अनुप्रिया (वलया), अंजली शर्मा(धोबन, जाबाला), सुशील कुमार देव(पंडित), मयंक कुमार शर्मा (पुण्डरीक), इन्द्रजीत (कन्हाई), अभिषेक (सिपाही), राज कुमार (वसंतक), सुधांशु शांडिल्य (व्रत), सौरभ कुमार, कृष्णा, अभिषेक, लक्ष्मी राजपूत, पिंकी, मुस्कान आदि ने अपनी दमदार अभिनय से नाटक को सफल बनाया. वहीं नवलेश शर्मा की संगीत परिकल्पना से भी नाटक को मजबूती प्रदान की.

सुशील कुमार भारद्वाज की रिपोर्ट

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