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विदेशों में संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही लखीसराय में मिली अद्भुत मूर्तियां

हिंदू व बौद्ध धर्म की मिश्रित संस्कृति की मिसाल रहे लखीसराय की अद्भुत मूर्तियां विदेशों में संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है। एक से बढ़कर एक सुंदर मूर्तियां इंग्लैंड, रूस और जर्मनी के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

देश-विदेश से पहुंचे सैलानी भी इन मूर्तियों की सुंदरता और नक्काशी देख आश्चर्य से भर जाते हैं। बताया जाता है कि काले पत्थर की इतनी खूबसूरत मूर्तियां अब नहीं बनती।

बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं की ये मूर्तियां अंग्रेजी शासनकाल में ही यहां से ले जाईं गई थी, जिसका प्रमाण भारतीय और विदेशी शोधपत्रों और पुस्तकों में मिलता है। संग्रहालय में मूर्तियों पर अभिलेख में भी जयनगर, हसनपुर का नाम दर्ज है। पटना, कोलकाता के संग्रहालय में भी लखीसराय की कई मूर्तियां हैं।

वर्मिंघम, बर्लिन और पीटर्सबर्ग में है मूर्तियां

रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में अवलोकितेश्वरा की मूर्ति है, जोकि भगवान बुद्ध के स्वरूप बताए जाते हैं। मृर्तिकला पर शोध करती रहीं अमेरिकी विदुषी क्लाउडीन पिक्रों ने अपने लेख में इसका जिक्र किया है। मूर्ति वर्ष 1945 तक बर्लिन में थी। इसके बाद पीटर्सबर्ग ले जाई गई। लखीसराय के जयनगर में कभी विजय श्रीभद्र ने यह मूर्ति दान की थी।

देवी पूर्णेश्वरी की मूर्ति इंग्लैंड के वर्मिंघम में संग्रहालय में है। अमेरीकी विद्वान फ्रेडरिक एम एशर ने रोम से प्रकाशित होने वाले जॉर्नल आर्टिबस एशिया में इसका उल्लेख किया है। ऐसी ही एक मूर्ति शहर के बालिका विद्यापीठ में है।

जर्मनी के बर्लिन में म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट में जांभल की मूर्ति है। मूलत: कोलकाता के गौरेश्वर भट्टाचार्य इस म्यूजियम में क्यूरेटर थे, जोकि अब वहीं बस गए हैं। पुरातत्ववेता डॉ अनिल बताते हैं कि जांभल बौद्ध धर्म के देवता हैं।

संग्रहालय बने, तो बची मूर्तियां सुरक्षित हों

सुखद आश्चर्य और गौरव से भर देनेवाली यह खबर यहां के लोगों के बीच एक निराशा भी पैदा करती है। निराशा, एक संग्रहालय न होने की। यहां बिछवे, लय, किष्किंधा, उरैन आदि पहाडिय़ों और कई जगहों पर मूर्तियां और अवशेष बिखड़े पड़े हैं। संग्रहालय बने, तो उन्हें सुरक्षित किया जा सकेगा।

साभार: लाइव हिंदुस्तान

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