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विमर्श: सामाजिक न्याय की बात आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग ही कर पाते हैं

” सामाजिक न्याय की बात आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग ही कर पाते हैं । आरक्षण की आवश्यकता इस कारण होती है कि वो आर्थिक समृद्धि प्राप्त हो सके । सामाजिक न्याय का आंदोलन समाजवाद की लड़ाई को भटकाता है। असली संघर्ष तो आर्थिक ही है।आज सामाजिक न्याय के नाम ऐसी ताकतें हैं जो खुद सत्ता में आने जे बाद अपने सामाजिक समूह व जाति के लोगों का तो ख्याल नहीं रखते। इनसे क्या उम्मीद की जा सकती है? ” ये बातें मगध विश्विद्यालय के प्रो वीसी कार्यानंद पासवान ने ‘केदार दास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान’ द्वारा आयोजित विमर्श ‘ सामाजिक न्याय : परिदृश्य व परिप्रेक्ष्य’ में बोलते हुए कहा।

माध्यमिक शिक्षक संघ भवन , जमाल रोड, में आयोजित पूरा कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था। पहला सत्र था ‘सामाजिक न्याय का मौजूदा दौर व साम्प्रदायिक शक्तियां’ ।

मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए दिल्ली विश्विद्यालय में प्रोफेसर रमा पॉल ने महिलाओं के दृष्टिकोण बहस की शुरुआत में कहा दिल्ली विश्विद्यालय में प्रोफेसर रमा पॉल ने कहा ” सामाजिक न्याय की बात करने वाले लोगों ने महिलाओं के प्रति वही सामंती नज़रिया रहता हैI कहा जाता है कि औरतों की बनावट घरेलू कार्यों के ही अनुकूल है। औरतों की भूमिका को घर तक सीमित कर उनके द्वारा किये गए श्रम को कमतर बताया जाता है। ये पूंजीवादी के लिए बेहद अनुकूल है। प्रेम, परिवार व नैतिकता का हवाला देकर महिलाओं को घर का काम कराया जाता है। सामाजिक न्याय का आंदोलन औरतों के सवाल को उठाये बगैर आगे नहीं बढ़ सकता। ”

‘सबाल्टर्न ‘ के संपादक महेंद्र सुमन ने कहा ” सामाजिक न्याय के प्रतिनिधित्व व सांकेतिकता बेहद जरूरी है। ओ.बी.सी जातियों को लगता है वे सत्ता के स्वाभाविक अधिकारी है। आरक्षण अभी भारत में लंबे समय तक रहने वाकई हैं। साम्प्रदायिक ताकतों ने इसे भावना का कुशलता से इस्तेमाल किया।उनका नेटवर्क बड़ा है, संसाधन बहुत है इस कारण वो पिछड़ी-दलित जातियों को एडजस्ट कर लेते हैं। आर्थिक लड़ाई भी वहीं आगे बढ़ती है जहां सामाजिक न्याय का आंदोलन पहले चल चुका है जैसे केरल, बंगाल, महाराष्ट्र आदि। धर्मनिरपेक्ष व वामपंथी शक्तियों को प्रतिनिधित्व के सवाल को माहिर ढंग से इस्तेमाल करना होगा।”

पसमांदा आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता नूर हसन ने कहा, “मूल लड़ाई अमीर और गरीब की है।हिन्दू और इस्लाम के खतरे में तब पड़ता है जब गरीब के बेटा बेटी अंतर्धार्मिक व अनतर्जातीय शादी करते हैं । अल्पसंख्यकों का एक खास केंद्र रहेगा तब तक बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता पर कगाम नहीं लगेगी। आज सामाजिक न्याय के नाम पर अल्पसंख्यकों के रूढ़िवादी ताकतों को बढ़ावा देती है। इन साम्प्रदायिक शक्तियों के पीछे उसके पीछे पूंजीवाद है। इसे समझने की आवश्यकता है।”

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए चर्चित इतिहासकार ओ.पी जायसवाल ने बुद्ध का उदाहरण देते हुए कहा, “पहला विभाजन सशक्त और अशक्त के मध्य हुआ है। जबसे भारतीय संस्कृति की शुरुआत हुई है तबसे सामाजिक न्याय का संघर्ष चल रहा है। लेकिन सब की जड़ मे ब्राहणवादी व्यवस्था है। ब्राहणवाद को बुद्ध ने लगभग समाप्त कर दिया था।यही सबसे खतरनाक है।”

उन्होंने आगे कहा ” पिछड़ी समुदाय के संपन्न लोगों को भी सामाजिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है। सिर्फ आर्थिक न्याय से सामाजिक असमानता खत्म नहीं होती। ब्राहणवादी भले सत्ता में न हो लेकिन वो हमारे दिमाग में बैठा हुआ। है।इससे मुक्ति अनिवार्य है।”

इस सत्र का संचालन वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता रवीन्द्र नाथ राय ने किया।

पहला सत्र बिहार में गरीबों -दलितों में नायकत्व का दर्जा रखने वाले नक्षत्र मालाकार जबकि दूसरा सत्र चर्चित वामपंथी सांसद रहे भोला मांझी नेको समर्पित था।

सत्र के प्रारंभ में नक्षत्र मालाकर के जीवन की संक्षिप्त रूप रेखा केदार दास श्रम व समाज अध्ययन संस्थान, पटना के अजय कुमार ने नक्षत्र मालाकार व भोला मांझी के जीवन की संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत किया।

दूसरा सत्र

दूसरे सत्र का विषय था ‘सामाजिक न्याय का आंदोलन और शासक वर्ग’। विषय प्रवेश करते हुए संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर ने आम्बेडकर, रामास्वामी नायकर, स्वामी सहजानन्द सरस्वती कई उदाहरणों देते हुए कहा, ” सामाजिक न्याय के आंदोलन में कौन सी कमजोरी है कि शासक वर्ग उसका इस्तेमाल कर लेती है। जो पिछड़ी जातियां दलितों के साथ वही उत्पीड़नकारी व्यवहार करते हैं जो उन्होंने उच्च जातियों के साथ खुद झेली है। जैसे मंडल कमीशन में भूमि सुधार की बात भुला दी गई। वामपंथियों ने सामाजिक उत्पीड़न के विरुद्ध सबसे अधिक संघर्ष किया लेकिन उनपर झूठा आरोप लगता है कि इन लोगों ने सामाजिक सवालों पर ध्यान नही दिया। उत्तरआधुनिक विचार का प्रभाव आज ये है कि ढांचे का सवाल का गौण होकर सिर्फ नज़दीकी उत्पीड़नकारी के विरुद्ध सामाजिक न्याय की ताकतें उन पर गुस्सा उतार देती है।”

साउथ एशिया यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रवि कुमार ने अपने संबोधन में कहा, “1989 में तीन बड़ी परिघटना घटी। नवउदारवाद का आना, साम्प्रदायिकता और सामाजिक न्याय का आंदोलन। व्यवस्था चाहती है । लोगों फ्रॉगमेन्टेड (विभाजनकारी) दृष्टिकोण से चीजों की देखें। सामाजिक न्याय की ताकत नवउदारवादी अर्थशास्त्र के कारण क्षीण होती चली जा रही है। सामाजिक न्याय के समर्थक होने का मतलब ये नहीं है कि आप श्रम कानून को कमजोर बनाएं। बिहार में सामाजिक न्याय के 25 वर्ष के बाद भी आजतक पाठ्यक्रम उसके अनुकूल नहीं बनाया गया है। प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य में कोई कटौती नही रहेगा। पूंजीवाद व जाति का संदर्भ अब बदल गया है।हमें हम नए संदर्भ में सोचना पड़ेगा। सोशल जस्टिस का आंदोलन हमेशा शासक वर्ग व साम्प्रदायिक ताकतों के साथ समझौता करते आया है।”

वरिष्ठ सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता अरविंद सिन्हा ने कहा, “लोहिया ने समान शिक्षा की बात की थी। शिक्षा में आरक्षण की बात नही की थी। आम्बेकर से प्रभावित होकर जो पार्टियां बनी उन संगठनों में खुद बहुत विषमता है। ये लोग कहते हैं कि सत्ता में ही जाने से सम्मान मिलेगा ये सही नही है।सामाजिक न्याय के नाम पर बनी पार्टियां जातिवादी दलों में पतित हो गई है। सोशलिस्ट पार्टी की शुद्ध अवसरवाद व गैरकांग्रेसवाद ने सामाजिक न्याय के आंदोलन को बर्बाद कर दिया। सामाजिक न्याय के मसीहा माने जाने वाले बी.पी मंडल तो खुद बड़े जमींदार थे। लोहिया और जयप्रकाश ने शुद्ध अवसरवाद की राजनीति की नींव डाली। विषमता की व्यवस्था चलती रही बस कुछ निचली जातियों के लोगों को कुछ पड़ वगैरह मिल जाये। रैडिकल बदलाव से खुद को अलग कर लिया इसी कारण ये आंदोलन भटक गया।”

महिला नेत्री सरोज चौबे ने कहा ” सामाजिक न्याय की बात तभी कह रहे हैं क्योंकि सामाजिक अन्याय है। पहले हमलोग कहते थे कि फासीवाद आ रहा है। अब उनके समर्थक कह रहे हैं कि ये हिटलरी कारनामा है खासकर बिहार में जिस तरह शासक वर्ग के पक्ष में तख्ता पलटा किया गया। अभी हमारे लिए चुनौती का समय है। देश भर में आंदोलन चल रहा है। महिलाए आंदोलनरत हैं। यदि आंदोलन करें तो फासिस्ट सत्ता को झुका सकते हैं।”

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए एम.एन कर्ण ने कहा ” न्याय में सामाजिक शब्द कैसे जुड़ गया? सामाजिक उत्पीडन, आर्थिक शोषण व राजनीतिक भेदभाव इन तीनों से जाति व वर्ग के सवाल को समझा जा सकता है। एकमात्र बिहार में दलित व महादलित दो श्रेणी है। किसी गांव को जाति व भूस्वामित्व के आधार पर बांट कर देखिए तो बहुत बात समझ में आती है। जातीय संरचना में वर्ग आधारित विषमताएं रहती है। सामाजिक न्याय के पुरोधा माने जाने वाले बी.पी मंडल के घर के सामने उच्च जाति के लोग जूता पहनकर नहीं जा सकते थे।”

सभा को राजाराम , सतीश कुमार, नरेंद्र कुमार, रामलला सिंह, मधु कुमारी आदि ने भी संबोधित करते हुए कहा ” सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाले आज दलाल बन चजे हैं । वर्ग संघर्ष जब आगे बढ़ेगा तब जाति का सवाल खुद ब खुद खत्म हो जाएगा। वामपन्थियों को छोड़ कौन लड़ा सामाजिक न्याय को लेकर ? सामाजिक न्याय वालों को तो वर्गसंघर्ष की लड़ाई के लिए साबित करना है। सैकड़ों लोग शहीद हुए हैं, बिहार की जेलों में बंद हैं।”

सत्र का संचालन शिक्षाविद अनिल कुमार राय ने किया धन्यवाद ज्ञापन चक्रधर प्रसाद सिंह ने किया।

दिन भर चले इस आयोजन में बड़ी संख्या में शहर जे बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृतिकर्मी इकट्ठा हुए। प्रमुख लोगों में सामाजिक कार्यकर्ता अक्षय ,मधु , विनीत राय, जयप्रकाश, अमरनाथ, मदन प्रसाद, ज्ञान चंद भारद्वाज, रामजीवन सिंह, राजकुमार शाही, राजीव रंजन, आशुतोष कुमार, भोला पासवान, सतीश कुमार, नरेंद्र कुमार, मधु कुमारी, जीतेन्द्र, कौरव पार्षद मोहन प्रसाद, नवाब आलम, चक्रधर प्रसाद सिंह, उमा कुमार, नवलेश, हर्षवर्धन शर्मा, रामलाल सिंह, परवेज शर्मा, राकेश कुमार, बिमल चन्द्र झा, बी एन विश्वकर्मा, अशोक कुमार सिन्हा, मंजीत आनंद , रासबिहारी सिंह आदि मौजूद थे।

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