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शीघ्र ही समग्र विश्व में हिंदी का स्थान सबसे ऊँचा होगा: मृदुला सिन्हा

पटना, 18 मार्च। विश्व में हिंदी का स्थान शीघ्र हीं सबसे ऊँचा होगा। हिंदी में देश को जोड़ने की ही नही, विश्व-बंधुत्व की अवधारणा की भाँति वसुधा को एक सूत्र में पिरोने की शक्ति है। साहित्यकारों को मधु-मक्खी की भाँति,शुभ विचारों के पराग-संग्रहित कर अमृत समान मधु समाज को देना चाहिए। आज बदले हुए समाज मे इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।

यह बातें आज यहाँ बिहार हिंदी साहित्य सम्मान द्वार आयोजित दो दिवसीय 39 वें महाधिवेशन का उद्घाटन करने के पश्चात अपने संबोधन में गोवा की महामहिम राज्यपाल एवं विदुषी साहित्यकार डा मृदुला सिन्हा ने कही। डा सिन्हा ने कहा कि, भारत के प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर में हिंदी भाषा का प्रयोग करना चाहिए। जब सभी भारतीय ऐसा करने लगेंगे तो स्वतः हिंदी के सामने आने वाली सारी बाधाएँ दूर हो जाएगी।

उन्होंने बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन की वर्तमान कार्यसमिति के कार्यों की सराहना करती हुई कहा कि, विगत ९९ वर्षों के इस गरिमामयी संस्था के पिछले 40 वर्षों में जो कार्य नही हुए,उसे वर्तमान समिति ने 4 वर्षों में कर दिखाया है। साहित्य सम्मेलन की पुरानी गरिमा लौट रही है, यह बहुत हीं प्रशंसनीय और संतोष जनक है।इसके पूर्व उन्होंने सम्मेलन के नव-निर्मित ‘शताब्दी-दार’ का लोकार्पण किया।

समारोह के मुख्य अतिथि और मेघालय के राज्यपाल गंगा प्रसाद ने कहा कि, सम्मेलन ने इस महाधिवेशन को, बिहार की हीं नही, देश की दो महान साहित्यिक विभूतियों आचार्य शिवपूजन सहाय तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन को समर्पित कर बड़ा हीं महत्त्व का कार्य किया है, जिनका यह 125वाँ जयंती वर्ष है। दोनों हीं विद्वान साहित्य के गौरव-स्तम्भ हैं।

उन्होंने सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष को ख़ूब धूम-धाम से मनाने का सुझाव देते हुए कहा कि, इसे गरिमापूर्ण ढंग से मनाया जाए और पूरे देश को साहित्य का बड़ा संदेश पहुँचे, ऐसे ऐतिहासिक आयोजन किए जाएँ।

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए अधिवेशन के स्वागताध्यक्ष और सांसद डा सी पी ठाकुर ने कहा कि, सम्मेलन का यह महाधिवेशन अपने शताब्दी-वर्ष के द्वार पर आयोजित हुआ है। इससे संपूर्ण बिहार हीं नही, बल्कि देश की हिंदी के प्रति निष्ठा बढ़ेगी। उन्होंने विद्वानों से आग्रह किया कि, हिंदी, विज्ञान और तकनीक की भाषा कितनी शीघ्रता से बने, यह सुनिश्चित करना चाहिए।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में सम्मेलनाध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि, इस अधिवेशन की व्यापक सफलता ने, विद्वानों को, सम्मेलन के उस स्वर्णिम-काल का स्मरण दिलाया है, जस काल में आचार्य शिवपूजन सहाय और नलिन विलोचन शर्मा जैसे विद्वान सम्मेलन में स्थायी रूप से रहकर हिंदी की सेवा कर रहे थे, और उस काल में देश के मनीषी साहित्यकार , सम्मेलन को ‘साहित्य का मंदिर’ समझ कर अपनी पूजा देने आते थे। डा सुलभ ने कहा कि, सम्मेलन के शताब्दी-वर्ष में, बिहार के सभी साहित्यकारों का परिचय-ग्रंथ प्रकाशित किया जाएगा। वे यह सुनिश्चहित करेंगे कि, प्रदेश का एक भी साहित्यकार इस ग्रंथ में आने से छूट नहीं जाए। प्रकाशय-ग्रंथ मन कवि के चित्र सहित परिचय के साथ उनकी प्रतिनिधि रचनाओं का प्रकाशन किया जाएगा।

उद्घाटन समारोह को सुप्रसिद्ध कवि डा सोम ठाकुर, कवि डा सुरेश अवस्थी, प्रो शशि शेखर तिवारी, डा एस एन पी सिन्हा, डा मेजर बलबीर सिंह भसीन, डा कुमार अरुणोदय ने भी अपने विचार व्यक्त किए। धन्यवाद-ज्ञापन सम्मेलन के प्रधान मंत्री आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव ने किया।

इस अवसर पर प्रो शशि शेखर तिवारी को महापंडित राहुल सांकृत्यायन समान, डा सोम ठाकुर को राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर सम्मान, डा सुरेश अवस्थी को गोपाल सिंह नेपाली सम्मान, मेजर बलबीर सिंह ‘भसीन’ को संत कवि गुरु गोविंद सिंह महाराज साहित्य साधना सम्मान, डा कमल मुसद्दी को चतुर्वेदी प्रतिभा मिश्र साहित्य-साधना सम्मान, डा अरुण सज्जन को राम वृक्ष बेनीपुरी सम्मान, डा शंभु प्रसाद सिंह को राम गोपाल शर्मा रूद्र सम्मान, महेश कुमार बजाज को महाकवि आरसी प्रसाद सिंह सम्मान, डा तारा सिंह को प्रकाशवती नारायण सम्मान, डा रमेश चौधरी ‘रमण’ को कलक्टर सिंह केसरी सम्मान तथा दीनानाथ साहनी को फनीशवनाथ रेणु सम्मान से सम्मानित किया गया।

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