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शीर्ष न्यायालयों की वर्तमान चुनौतियाँ

भारतीय परिदृश्य में न्याय कितना सुगम और पुख्ता है इस पर विचार करने की आवश्यकता है। आज ये प्रश्न वाज़िब है की भारतीय न्याय प्रणाली कितना संविधान सम्मत है और कितना लोकतान्त्रिक।

अगर कोई भारतीय न्याय की कुछ खामियों पर बात करना चाहता है इसका बिलकुल मतलब नहीं है कि वो भारतीय न्याय व्यवस्था से पूरी तरह असहमत है। परंतु ये भी उतना ही सत्य है की इस व्यवस्था में भी खामियों का पदार्पण हुआ है।

हमारा आईन संविधानवाद के सिद्धांतों पर आधारित है जिसका मूल है कि राज्य पर जनता का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मालिकाना हक बना रहे। इसके लिए सरकार के तीनों अंगो पर जनता के माध्यम से नियंत्रण बनाने का प्रयास किया गया। विधायिका सीधे जनता के नियंत्रण में होती है जबकि कार्यपालिका सामूहिक दायित्व के सिद्धांत के कारण विधायिका के अधीन होता है।

इसका अर्थ ये है कि कार्यपालिका विधायिका के प्रति उतरदायी होती है क्योंकि विधायिका प्रत्यक्ष रूप से जनता के प्रति उतरदायी रहती है। न्यायपालिका पर महाभियोग के माध्यम से विधायिका का एक नियंत्रण रहता है। ये बात इतर है की आज के दौर में जहां एक पूर्ण बहुमत की सरकार है पर महाभियोग जैसा कोई भी तरीका न्यायालय को प्रभावित नही कर पाती। लोकतन्त्र में सरकार के हर संस्था पर जनता का अप्रत्यक्ष नियंत्र होना चाहिए परंतु मौजूदा न्यायपालिका की जवाबदेही तय करने वाला कोई नहीं है।

भारतीय शीर्ष न्यायपालिका की अपारदर्शी और आलोकतांत्रिक चयन प्रक्रिया काफी हद तक जातिवाद का शिकार प्रतीत होती है। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव है। कालेजियम सिस्टम के बाद शीर्ष न्यायपालिका न्यायाधीशों के चयन से लेकर स्थानांतरण तक के मामले मे सर्वेसर्वा हो गयी।

यहाँ पर लॉर्ड एकटन का प्रसिद्ध सूक्ति याद आती है की शक्तियाँ भ्रष्ट बनाती है और पूर्ण शक्ति पूर्ण रूप से भ्रष्ट। जिसके फलस्वरूप ये पद कुछ निश्चित जाति, परिवार और मानसिकता तक सीमित हो गयी। क्योंकि इनके अंदर ‘अंकल सैम’ और भाई भतीजावाद जैसे सिद्धांतों का काफी प्रचलन आया है।

मैं न्यायालय के अंदर किसी तरह के आरक्षण का पक्षधर न होते हुये भी मैं न्यायालय से उम्मीद रखता हूँ कि वो सभी प्रकार के विसंगतियों को समझते हुये अपनी निष्पक्षता बनाए रखे। ये लोकतान्त्रिक परिवेश ने न्यायालयों कि पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर न्यायालय ऐसा करने मे असमर्थ महसूस कर रही है तो वहाँ ये जरूरी हो जाता है की न्यायालय के अंदर हर वर्ग का प्रतिनिधि रहे।

न्यायालय में अगर किसी ख़ास वर्ग का ही आधिपत्य रहेगा तो ये कहना मुश्किल होगा कि वो इस बहुरंगी समाज के हर तपके के लिए वर्गविहीन न्याय कि स्थापना कर सकता है। कई मुख्तलिफ़ मौक़ो पर जो शीर्ष न्यायलयों के विचार आरक्षण, भूमिहीन समाज़, वर्ग संघर्ष और उनके विकास पर आयें हैं इसपे विमर्श कि आवश्यकता है।

भारतीय न्याय प्रणाली कॉमन लॉं पर आधारित है जिसका मतलब ये है कि पुलिस न्यायालय के अभिकर्ता के रूप मे काम करती है और न्याय के लिए साक्ष्यों का संकलन करती है। ये भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है की मेरी न्याय व्यवस्था पुलिसिया तंत्र पर आधारित है। इसमे सुधार के लिए न्यायमूर्ति वी॰ स॰ मालिमथ की कमिटी गठित की गयी थी पर उनके अधिकतर सुझावों को आज तक दरकिनार किया जा रहा है। आगे की बात कुछ उदाहरणों के जरिये करना बेहतर हैं।

बिहार में एक नवीन जनपद है अरवल। वहाँ 9 जनवरी 1998 को 9 लोगों की हत्या कर दी गयी थी उस समय ये जहानाबाद जिले का हिस्सा था। सत्र न्यायालय ने लगभग सभी 14 आरोपियों को उम्र कैद दी। जबकि माननीय शीर्ष न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव मे बरी कर दिया।

ठीक इसी तरह इस घटना के कुछ दिन पूर्व 1 दिसंबर 1997 को लक्ष्मणपुर-बाथे में भूमि विवाद को लेकर हुए नर संहार में कुछ भूपतियों और शीर्ष जाति के प्रतिबंधित संगठन रणवीर सेना के लोगों ने एक दिसंबर 58 दलितों की हत्या कर दी थी। मरने वालों में 27 औरतें 16 बच्चे शामिल थे। रणवीर सेना के करीब 100 सशस्त्र सदस्य आरा से सोन नदी के जरिए लक्ष्मणपुर-बाथे गांव पहुंचे थे और इस नरसंहार को अंजाम दिया था।

इस चर्चित नरसंहार केस में पटना शीर्ष न्यायालय द्वारा सभी 26 आरोपी बरी हो गए हैं। निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए पटना हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

मैं इस लेख में दलित समर्थन या राजनीति पर बात नहीं कर रहा हूँ। पर विधि के विद्यार्थी के नाते मेरा ये प्रश्न है की क्या वहाँ हत्याएं नहीं हुयी। अगर ये लोग उसमे दोषी नहीं थे तो कौन दोषी था? क्या आज लगभग 20 साल बाद उन सबूतों को इकट्ठा करना संभव है कि इस नरसंहार के वास्तविक अपराधी कौन है?

अगर नहीं तो क्या दलितों को न्याय के लिए न्यायालय से उम्मीद नहीं करना चाहिए और क्या इसे वंचित वर्ग के न्याय का नरसंहार कहा जाना चाहिए? पुलिसिया तंत्र में आदत आम है कि वो मुख्य दोषियों कि जगह किसी और को नामजद करते हैं या कई मौक़ो पर दोषियों के खिलाफ़ मिले साक्ष्यों को कमजोर करते है। आगे वो या तो उससे अभियुक्त बनाया जाता है जो या तो दोषी नहीं होता या उसके खिलाफ़ उचित सबूत नहीं होते। लक्ष्मणपुर-बाथे से लेकर अरवल तक यही हुआ है ।

उपर लिखे सारे प्रश्नो को एक मौजूदा घटनाक्रम से जोड़ कर देखने का प्रयास करता हूँ। जेएनयू को 9 फरवरी 2015 की घटना कुछ मीडिया चैनल के माध्यम से दिखाया गया कुछ लोगो ने भारत विरोधी नारे लगाए थे और इनमें जेएनयू के तत्कालीन प्रेसिडेंट सहित आठ लोगों पर प्रथिमिकी दर्ज कराई गयी। परंतु प्रथम दृष्ट्या जो लोग विडियो मे दिख रहे थे वो किसी भी करवायी से वंचित रह गए।

आज तक कन्हैया सहित आठ आरोपी पर पुलिस ने आरोप पत्र तक दाख़िल नहीं कर पायी है। हालाकि उन 8 लोगो की संलग्नता नहीं है ये सिद्ध करने में हमारे न्यायतंत्र को दो दशक लग जाए तो फिर उन गोरे चिट्टे नकाबपोशों को तलाशना मुश्किल हो जाएगा और हम असली नारेबाजों को कोई दंड नहीं दे पाएंगे। ये मेरी कोरी संभावना है, मामला न्यायालय मे विचाराधीन है। इसलिए कुछ ज्यादा कहना पूर्वाग्रह भी हो सकता है।

हमारी न्यायपालिका अपने आंशिक-सामंती चरित्र, जजों की कम संख्या और न्याय के लिए पुलिस पर निर्भरता से अपने अंदर तमाम अलोकतांत्रिक खामियों की उपस्थिती दर्शाती है। ये न्यायपालिका के सामने बड़ी चुनौती है की वो कहाँ से कृष्ण अय्यर जैसे विभूति को तलाशता है और सामाजिक न्याय की नयी पराकाष्ठा गढ़ता है।

ये बात दीगर है कि न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर को मद्रास हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट जाने में उनका नाम तीन बार वापस किया गया। मेरा उद्देश्य अपने सर्वसम्मानीय शीर्ष न्यायालयों पर आरोप लगाना नहीं है। परंतु न्याय प्रणाली के खामियों को उजागर करना है । जिससे हमारे वंचित वर्गों का भी अपने न्याय प्रणाली पर विश्वास क़ायम हो सके और हम एक लोकतान्त्रिक जरूरतों के हिसाब से न्यायालय के प्रकृति को स्थापित कर सके।

सब मिला कर चयन प्रक्रिया और तफ्शीश में बदलाव की दरकार है। मेरा मानना है कि ये सुधार शीर्ष न्यायालयों को खुद ही करना चाहिए जिससे न्यायालय की स्वतन्त्रता बरक़रार रहे। में उम्मीद करता हूँ मेरे शब्द सत्य की वकालत करते समय मेरे किसी वैधानिक जिम्मेदारियों का अतिक्रमण न करते हो।

राजीव रंजन
लेखक उत्तरांचल विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं।

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