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संवेदना के दर्द का खतियान है ‘माटी माटी अरकाटी’

आदिवासी क्षेत्र झारखंड के वासियों के कैरिबियन क्षेत्र में हिलकुली के नाम से पहचान बनाने वाले मजदूरों के जीवन और संघर्ष का दस्तावेजीकरण नहीं कलाकरण है श्री अश्वनी कुमार पंकज का पहला उपन्यास ‘माटी माटी अरकाटी’।

इस रूप में यह एक केंद्रित और साभिप्राय लिखा गया विसंरचनावादी उपन्यास है। इसकी निष्कर्षगत कथा का आधार है यह लोक अभिव्यक्ति की माटी काटते-काटते आरी भी बदमाशी  में काट दी जाती है। इसी तरह हिलकुली नाम से जो आदिवासी झारखंडी जमात कैरिबियन आदि देशों में अपनी विवशता लेकर गई उनके सांस्कृतिक विभाजन की आरी ही बहुसंख्यक भोजपुरी क्षेत्र से गए मजदूर समाज की वर्चस्ववादी संस्कृति ने काट दिया, यही लेखक की पीड़ा है।

इस पीड़ा को किताब के फ्लैप पर ही स्थापित कर दिया गया है। यह अपनी दृष्टि से लेखक की साफ स्थापना है जिससे किसी भी वर्चस्ववादी यथास्थिति को गलत मानने वाली समझ का विरोध स्वाभाविक है। मेरे ख्याल से इसी स्वाभाविक में ही वह अंतर्विरोध उजागर हो जाता है जिसे दो संस्कृतियों खासकर भाषाई संस्कृति की संरचना में भोजपुरी भाषी संस्कृति पर लेखक ने जड़ दिया है।

लेखक का यही कथानक है कि कैसे कैरिबियन क्षेत्र में नवनिर्मित भोजपुरी दुनिया ने हिली कुलियों को अपने वर्चस्व में गड़प लिया है। यह तथ्य सत्य भी हो सकता है जैसा कि लेखक ने दर्षाया है। यहीं पर कल्पना के रूप में गड़प लेने का अर्थ समझ में नहीं आ पाता है। या तो लेखक ने अपना निष्कर्ष जल्दी में निकाला है या यह उनका पूर्वाग्रह है। उपन्यास का करीब जल्दी में पढ़े जाने के अनुमान के अनुसार तीन चौथाई हिस्सा आदिवासी जीवन की उप निवेशों में झेली गई व्यथा पर केंद्रित है। केवल अंत के 30-40 पन्नों में निष्कर्ष की तरह उनकी उपर्युक्त स्थापना एक क्षेपक की तरह आई है।

यह आज तक के समाजशास्त्रीय अवलोकन में है कि धन की ताकत जब किसी भी सामाजिक गठन में आती है तो परंपरागत रूढ़ि का चलन अपना सिर उठा लेता है। इसे ही समाज की सांस्कृतिक अस्मिता का नाम दिया जाता है। इतिहास के वर्गीय संघर्ष का उच्छेदन करने के लिए उपभोगतावादी भूमंडलीकरण की अपसंस्कृति की चाल ने इस तरह की सांस्कृतिक अस्मिता की ढाल को ही अपने लिए उपयुक्त समझा है जो बिलकुल मानवीय और नैतिक मूल्यों से साहित्य, उपन्यास और इतिहास को रहित करने के लिए एक साजिष की तरह आज के विचार चिंतन के सामने है।

इसी हथियार से सांस्कृतिक टकराहट के मुहावरे को आज हर देश में खड़ा किया गया है। यह पहचान करना इस उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है कि लेखक की स्थापना क्या इसी नवपूंजीवाद चाल की षिकार है या यह उनकी खोजी समाजशास्त्रीय अध्ययन और समझ का निष्कर्ष है। इस पर लेखकीय सफाई की मांग की जानी चाहिए, क्योंकि इस उपन्यास के पाठ में कदम-कदम पर लोक संस्कृति की जीवन छवियां और गीतों का ही बाहुल्य है।

यह इस बात का प्रमाण है कि लोक संस्कृति कभी मरती नहीं। इस बात को लेखक स्वीकार कर रहे हैं। यही पर आदिवासी लोक संस्कृति के भोजपुरियत में विलोपन को सिद्ध करने का कमजोर तर्क देते हैं। संवेदना के दर्द का आधार लेकर यह कहकर कि आदिवासी संस्कृति को गायब कर दिया गया है।

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि अंग्रेजियत की उपभोक्तावादी संस्कृति मिषनरी पढ़ाई आदि के जरिए पहले आदिवासियों क्षेत्रों के दरवाजे से ही भारत या विश्व  के किसी क्षेत्र में फैली है जहां मूल के खतम होने का कोई जन विक्षोभ नहीं है। बहुलता एकरूपता में विलीन होती जा रही है। ऐसे में संस्कृतियों की टकराहट, गड़प का सवाल ही अप्रासंगिक हो जाता है। लेखक ने संख्याबल का आधार लिया है। कम संख्या में होने के आधार पर ब्राहणवादी व्यवस्था की जाति में आदिवासी जमात का पर्यवसन हो गया है यही लेखक के दर्द का मापक है।

यह बात संवेदना के स्तर पर ग्राह्य हो सकती है पर समाजशास्त्रीय माप से यह एक समाजिक विघटन है। पूरी दुनिया में शहरीकरण के आकर्षण के चलते। अतः अपनी संवेदना का लेखक ने जो खतियान तैयार किया है-यह कभी भी भोजपुरियत वर्चस्व का अधिनायकवाद नहीं है, स्वयं का बिघटन है-एक उपभोगता मनुष्य बन जाने या बना दिए जाने की नियति के चलते। हम खुद उपभोगतावादी हाथी पर चढ़कर कहें कि हमारी रंग-रूप पहचान खतम कर दी गई है।

स्वयं लेखक का पूरा उपन्यास मगही भोजपुरी लोक स्वरों से मिश्रित छोटानागपुरिया, संथाल भाषाई स्वर को उद्वृत करता है। तो क्या कैरीबियन आदि क्षेत्रों में ऐसी भाषाई संवेदना का पतन हुआ है? जब भोजपुरी जमातों आदि में इसका पतन नहीं हुआ है तो अल्पसंख्यक आदिवासी जमात में अपने सांस्कृतिक स्वत्व नाच-गान का पतन हुआ है यह स्वीकार्य नहीं है। मगही प्रभाववाली बोली बानी, संस्कार पर्व को भोजपुरियत ने अगर समाप्त किया है कैरीबियन आदि क्षेत्रों में तो यह सांस्कृतिक पिछड़ापन है जिसे अंग्रेजी में सोशल कल्चरल लाॅग कहते हैं। कुछ समाज पिछड़ जाते हैं आधुनिकता का वरण करने में तो आदिवासी जमात इसी मानी में पिछड़े नहीं हैं-वर्चस्व का अनुकरण प्रभाव के बल पर कर रहे हैं, ऐसा नहीं है, यह उनका सामाजिक गंतव्य है-कि वे पीछे नहीं रहें जब उपभोक्ता संस्कृति का आतंक जीवन बन गया हो।

लेखक की जो भी स्थापना है वह नया विषय है जिसे उन्होंने अस्मिता स्थापन के नए विमर्शों  के दौर में आदिवासी पीड़ा के एक क्षेत्र को शामिल किया है। यह नितांत पूंजीवादी चाल का प्रभाव नहीं है। वे साफ कहते हैं कि उनका उपन्यास इतिहास या समाज पलटने का कोई दावा नहीं है। यह मात्र उनकी पीड़ा है। लक्ष्य है इतिहास की स्मृतियों को दुरुस्त करने का। यह दुरुस्ती इस बात की है कि पूरब और पश्चिम में दोनों सभ्यताओं में गैर आदिवासी समाजों में नस्लीय और ब्राहणवादी मूल आंतरिक चरित्र की मौजूदगी खतम नहीं हुई है बल्कि और कम रही है-यह बताना। तो यही बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से इनकी साभिप्रायता है जिसके आधार पर इस उपन्यास को मैंने विसंरचनावादी कृति कहा है जो हिंदी साहित्य में हाल ही में शानी के ‘काला जल’ मंजूर एतेशाम के ‘सूखा बरगद’, ‘बशारत मंजिल’, असगर वजाहत के ‘सात आसमान’ संजीव के ‘सूत्रधार’ और विमर्श केंद्रित उपन्यास ‘फांस’ से शुरू हुआ है।

यह क्लोजअप ही ‘माटी माटी अरकाटी’ का मर्म है। यह मर्म फूटा है पूरे उपन्यास में गीतों की भरमार से। इस कथन से कि ‘आगे का सच अब आप सब को कहना है, इसमें सच उतना ही है जितना दाल में नमक होता है। बाकी सब काल्पनिक है।’

इस सब की तरलता का केंद्र हैं लेखक द्वारा सृजित कांता का नायकत्व-आदिवासी सरलता, चुप्पी सहजता, निर्बलता और धनलोलुपता से परे सामूहिक सहजीविता का सौंदर्य, अंडा जब फूटता है तो पंख फूटते हैं यह लोक उक्ति। इसी रूप में यह उपन्यास डाक्यूमेंटशन  अभिलेखीकरण नहीं है बल्कि एक कलाकरण-मोनुमेंटाइजेशन है। मनुष्य को संवेदनशील , अंतर्विरोध मुक्त सांस्कृतिक मनुष्य बनाने की प्रेरणा है। आज तक के ज्ञान का प्रतिवाद है कि दूसरे हमको अभी तक व्यक्तिवादी, भौतिकवादी, रूढ़िवादी  और भोगवादी बनाकर-मनुष्य विरोधी बनाया है। अतः यह प्रतिरोध का उपन्यास है-मनुष्य विरोधी आकांक्षाओं का प्रतिरोध ही साहित्य का प्रतिरोध कहलाता है। उपन्यास के एक नैतिकशास्त्र होने की मांग को यह उपन्यास पूरा करता है।

श्रीराम तिवारी
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