+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com

सच्चे अर्थों में भारतीय आत्मा थे पं माखन लाल चतुर्वेदी

पटना, 4अप्रैल। देश के महान स्वतंत्रता सेनानी, कवि और पत्रकार पं माखनलाल चतुर्वेदी सच्चे अर्थों में ‘भारतीय आत्मा’ थे। उन्हें यह महान संबोधन राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने दिया था। वे जीवन-पर्यन्त राष्ट्र और राष्ट्र-भाषा के लिए संघर्ष रत रहे। स्वतंत्रता-संग्राम में जेल की यातनाएँ भी भोगी और हिंदी के प्रश्न पर भारत सरकार को ‘पद्म-भूषण समान’ भी वापस कर दिया। वे एक वलिदानी राष्ट्र-प्रेमी थे। उनके विपुल साहित्य के मूल में, प्रेम और उत्सर्ग की भावना है। उनमें राष्ट्र-प्रेम है, प्रकृति-प्रेम है और वह शाश्वत प्रेम भी है, जिसे मनुष्य का पाँचवाँ पुरुषार्थ कहा जाता है। ‘पुष्प की अभिलाषा’ का वह महान गीतकार, देश और देश के लिए मर मिटनेवाले लाँखों वीर सपूतों की अशेष प्रेरणा है।

यह बातें आज यहाँ साहित्य सम्मेलन में कवि की 130वीं जयंती पर आयोजित समारोह व कवि-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, चतुर्वेदी जी अद्भूत प्रतिभा के कवि, पत्रकार और लेखक थे। उनकी प्रथम काव्य-पुस्तक, ‘हिम किरीटिनी’ के लिए,1943 में, उन्हें तबके श्रेष्ठतम साहित्यिक सम्मान, ‘देव-पुरस्कार’ से अलंकृत किया गया था। साहित्य अकादमी की ओर से हिंदी का प्रथम अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव भी उन्हें ही प्राप्त है। उनकी पुस्तक ‘हिमतरंगिनी’ के लिए यह पुरस्कार १९५४ में साहित्य अकादमी की स्थापना के बाद दिया गया था।

अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त ने कहा कि, माखन लाल जी हिंदी के लिए हर प्रकार के वालिदान के लिए सदा तत्पर रहे। इसके लिए उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री नेहरु जी से भी लड़ने से संकोच नहीं किया। सम्मेलन के उपाध्यक्ष पं शिव दत्त मिश्र, डा शंकर प्रसाद, डा कल्याणी कुसुम सिंह, अमियनाथ चटर्जी तथा अनुपमानाथ ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए।

इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन का आरंभ कवि जय प्रकाश पुजारी की वाणी वंदना से हुआ। वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’ ने हर एक चीज़ की अहमीयत को इस तरह समझाया कि, “एक तीली ही बहुत है काम न उसको आँकना/ इक जलाओगे, दिया से ही दिया जल जाएगा”।

डा शंकर प्रसाद ने तरन्नुम से ग़ज़ल पढ़ते हुए कहा कि, “अब यार की गली में सजदा का हर मक़ाम/ सजदा जो किया हमने तो रहमान बन गए”। कवि सुनील कुमार दूबे ने भारत की मिट्टी को इन पंक्तियों से नमन किया कि, “अलग तासीर इस धरती की है, कुछ इस तरह समझो/ यहाँ के बीज हीं, तुलसी कभी रसखान देते हैं”। युवा कवयित्री प्रेरणा प्रताप ने कहा कि, “ कवयित्री नहीं मै, न लिखी कोई कविता/ फ़क़त ये बाग़ी ख़याल है मेरे। जब सोते हैं, शब्द मेरे / तब जागते ये बाग़ी ख़याल हैं मेरे”। वरिष्ठ गजलगो घनश्याम का कहना था – “मुझमें जो बहती है, जो नदी मेरी/ दरसल है वो शायरी मेरी/ मैंने जिसके लिए दुआ की थी। छीन ली उसने ही ख़ुशी मेरी”।

अपने अध्यक्षीय काव्य-पाठ में डा अनिल सुलभ ने व्यथित मन को बहलाने को इन पंक्तियों को चुना कि, “वर्तमान के कोलाहल से थक चुका है भोला मन/ ठंढक पहुँचे तप्त हृदय को, गीत पुराना मीत सुनाना/ इस तरफ़ जब भी कभी, तेरा हो आना जाना/ मीत याद कर एक बार फिर मुझे बुलाना/ वह जो मन को बहलाए, मीठी मीठी बात सुनाना”।

सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा कल्याणी कुसुम सिंह, डा अर्चना त्रिपाठी, डा शालिनी पाण्डेय, पूनम आनंद, सागरिका राय, बच्चा ठाकुर, अमियनाथ चटर्जी, सुनील कुमार दूबे, अनुपमा नाथ, प्रेरणा प्रताप, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, डा सुमेधा पाठक, लता प्रासर, शुभ चंद्र सिन्हा, डा सूलक्ष्मी कुमारी, नंदिनी प्रनय, डा रमाकान्त पाण्डेय, कुंदन आनंद, पं गणेश झा, नेहाल कुमार सिंह ‘निर्मल’, श्रीकांत व्यास, राज किशोर झा, पंकज प्रियम बाँके बिहारी साव, आदि कवियों ने भी अपनी रचनाओं से वातावरण में रस की वर्षा की। इस अवसर पर प्रो सुशील कुमार झा, डा नागेश्वर प्रसाद यादव, पं पवन कुमार मिश्र, कृष्ण मोहन प्रसाद , डा अशोक कुमार समेत बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे। मंच का संचालन कवि राज कुमार प्रेमी ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

Related Posts

Leave a Reply

*