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साहित्य सम्मेलन में मनाई गई देश रत्न तथा कविवर रामचंद्र भारद्वाज की जयंती

भारत के प्रथम राष्ट्रपति देश-रत्न डा राजेंद्र प्रसाद, सादगी, त्याग और तपस्या की विनम्र मूर्ति थे। उनका सारा जीवन देश को समर्पित रहा। परिवार से वे प्रायः दूर ही रहे। वे भारतीय संस्कृति और उसके मूल विचार, ‘सादा जीवन- उच्च विचार’ के जीवंत उदाहरण थे। वे एक उच्च कोटि के लेखक और पत्रकार भी थे। हिंदी उनके साँसों में थी। वे राजनीति और समाजसेवा के आदर्श हैं।

यह बातें आज यहाँ हिंदी साहित्य सम्मेलन में देश-रत्न तथा कविवर रामचंद्र भारद्वाज के संयुक्त जयंती समारोह का उद्घाटन करने के बाद अपने संबोधन में राजेंद्र बाबू की पौत्री और विदुषी लेखिका तारा सिन्हा ने कही।

डा सिन्हा ने कहा कि, देश-रत्न ने अपने परिवार को भी गाँधी के विचारों में ढाला। उन्होंने स्वयं को ही नही, पूरे परिवार को गांधिमय और देशमय बना दिया था। घर के सारे हीं लोग खादी पहनते थे। चरख़ा चलाते थे। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नही था। वे एक अद्भुत व्यक्तित्व के स्वामी थे।

सभा की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कहा कि, राजेंद्र बाबू ने स्वतंत्रता और हिंदी की लड़ाई एक साथ लड़ी। वे अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन से, उसकी स्थापना के काल से जुड़े हुए थे। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के तो वे संस्थापक हीं थे। उनकी साहित्यिक प्रतिभा भी मूल्यवान थी। उनके विचारों और आचरण की भाँति उनकी भाषा भी सरल और सादगी के सौंदर्य से भारी हुई थी। हिंदी साहित्य और साहित्य सम्मेलन उनका सदैव ऋणी रहेगा।

डा सुलभ ने सम्मेलन के पूर्व प्रधान मंत्री और यशस्वी कवि पं रामचंद्र भारद्वाज को स्मरण करते हुए, उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी एर कहा कि, भारद्वाज जी कोमल भावनाओं के कवि थे। अपनी कविताओं को वो बड़े हीं प्रभावशाली ढंग से पढ़ा करते थे। वे मंच के अत्यंत प्रभावशाली कवि थे। वे साहित्य के क्षेत्र से राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे। सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त, डा शंकर प्रसाद, साहित्यमंत्री डा शिववंश पाण्डेय, चंद्रदीप प्रसाद ने भी अपने विचार रखे।

इस अवसर पर आयोजित कवि-गोष्ठी का आरंभ राज कुमार प्रेमी ने वाणी-वंदना से किया। कवि जय प्रकाश पुजारी ने अपने दिल की बात इस तरह से की कि, “हद से गुज़र गए वो दोस्ती से पहले/ दिल में उतर गाए वो दोस्ती से पहले।” डा शंकर प्रसाद का कहना था कि,”तारों की चमक-सी प्यार की साँसे जवान हैं/ कमसिं नाजनीं की हसरते जवान हैं।

कवि इंद्र मोहन मिश्र ‘महफ़िल’, बच्चा ठाकुर, ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, कवयित्री लता प्रासर, नंदिनी प्रनम, डा नीतू, शालिनी पाण्डेय, सच्चिदानंद सिन्हा, सुनील कुमार दूबे, अनिल कुमार सिन्हा, कुमारी मेनका ने भी अपनी रचनाओं का पाठ किया।

इस अवसर पर, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, अर्जुन प्रसाद सिंह, श्याम नारायण महाश्रेष्ठ, पवन कुमार मिश्र, डा हँसमुख सिंह, डा मुकेश कुमार ओझा, चंद्रशेखर आज़ाद समेत बड़ी संख्या में कविगण एवं सुधिजन उपस्थित थे। मंच का संचालन कवि योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद ज्ञापन कृष्णरंजन सिंह ने किया।

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