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‘स्वाधीन कलम’ के स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी कवि थे नेपाली

‘मेरा धन है स्वाधीन कलम’ के अमर रचनाकार, कविवर गोपाल सिंह नेपाली, विलक्षण प्रतिभा के स्वाभिमानी और राष्ट्रवादी कवि थे। वे प्रेम और स्फूरण के अमर गायक थे। उनके गीतों में देश-भक्ति और सारस्वत श्रींगार था। वे सही अर्थों में गीतों के राज कुमार थे। उनकी लेखनी से गीतों की निर्झरनी बहती थी। अपने समय के वे सबसे लोकप्रिय कवि थे। चीन के साथ हुए युद्ध के दौरान भारतीय सैनिकों के उत्साह-वर्द्धन और देशवासियों को जगाने के लिए नेपाली जी ने जो कुछ लिखा और घूम-घूम कर अलख जगाया,वह भारत के साहित्यिक इतिहास का अत्यंत लुभावना और अमिट हिस्सा है।

यह बातें आज यहाँ कविवर गोपाल सिंह नेपाली की 106 वीं जयंती पर आयोजित श्रद्धा-तर्पण-समारोह एवं गीत-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। डा सुलभ ने कहा कि, नेपाली जी शब्दों, भावों और काव्य-कल्पनाओं के हीं नहीं ‘स्वाभिमान’ के भी धनी थे। उन्होंने कभी भी अपने स्वार्थ में, न तो किसी की निंदा और न हीं किसी का वंदन ही किया। उन्होंने अपनी इन पंक्तियों में ही अपने चरित्र का परिचय दिया कि, “लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी से/ बचता हूँ कैंची दर्ज़ी से/ आदत न रही कुछ लिखने की निदा वंदन ख़ुदगर्ज़ी से/ तुम दलबंदी में लगे रहे, यह लिखने में तल्लीन कलम/ मेरा धन है स्वाधीन कलम”। नेपाली की यह पंक्तियाँ संसार के सभी नेक कवियों के संकल्प को अभिव्यक्ति देती है। ख़ुदगर्ज़ी से निंदा,वंदन करनेवाला ‘कुछ और’ हो सकता है, ‘कवि’ नहीं।

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के वरीय उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त ने नेपाली के साथ अपनी मधुर-स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि, अपने निधन के एक दिन पूर्व नेपाली जी भागलपुर आए थे। उस रात वे उनके ही भागलपुर स्थित आवास पर ठहरे थे। कहलगाँव के शारदा पाठशाला में उनका काव्य-पाठ हुआ। गए रात तक रस-रागिनी बरसती रही। ‘हिमालय ने पुकारा’ की लगभग सारी हीं रचनाएँ उन्होंने पढ़ी। यह उनकी अंतिम काव्य-संध्या थी। हिंदी-संसार ने अपना बड़ा हीं चमकता सितारा खो दिया।

सम्मेलन के उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, डा वासकी नाथ झा, चंद्रदीप प्रसाद, अंबरीष कांत तथा डा नागेश्वर प्रसाद यादव ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर छात्र-कवि अश्वनी कुमार ‘कविराज’ के कविता-संग्रह ‘अनुभव ज़िंदगी के’ का लोकार्पण भी क्या गया।

इस अवसर पर आयोजित गीत-गोष्ठी का आरंभ कवि राजकुमार प्रेमी ने नेपाली के लोकप्रिय भाजन, “दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरी अँखियाँ प्यासी रे” का सस्वर पाठ कर किया। वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’ ने कहा- “मूरत तो गाढ़ी, भरने को जान बाक़ी/ वह भंगिमा ज़रूरी, मुस्कान अभी बाकी/ जो लिख रहा कहानी पूरी वो हो चली है/ बस अंत ज़रा बाक़ी, उनवान अभी बाकी”। डा शंकर प्रसाद ने अपने दर्द का इस तरह बयान किया कि, “दुनिया के सितम दिल पे उठाए चले गए/ दीवानगी में ग़म को भुलाए चले गए”।

गीत के लोकप्रिय कवि विजय गुंजन ने कवि-गोष्ठी में इन पंक्तियों से एक नया ही रंग भरा – “मोरपंखी शाम की सुषमा सुहानी भेजना/ नेह से भींगे नयन की कहानी भेजना/ साधना से भर सदी आबाद जो करते रहे/ उस परश के उस शहर से गीत धानी भेजना”। तल्ख़-तेवर के कवि ओम् प्रकाश पांडेय ‘प्रकाश’ ने स्त्री-विवर्श को इस रूप में चित्रित किया कि, “एक फूल से डरकर/ खड़ी थी एक औरत/ लेकर एक हाथ में गिर गिट दूसरे में सियार/ था समझना मुश्किल कि डॉन में कौन ज़्यादा होशियार?”।
डा मेहता नगेंद्र सिंह, बच्चा ठाकुर, कमलेन्द्र झा ‘कमल’, पं गणेश झा, नलिन प्रसाद नलिन , शायर फ़हद आलम, कवयित्री अनुपमा नाथ, शालिनी पाण्डेय, कुमारी नंदिनी, सुधीर कुमार, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, डा बी पी त्यागी, मोहन दूबे, आदि कवियों और कवयित्रियों ने भी मधुर-कंठी-गीतों से इस गीतांजलि को चिर-स्मरणीय बना दिया। इस अवसर पर, बाँके बिहारी साव, डा बी एन विश्वकर्मा, विश्वमोहन चौधरी संत, डा शंकर शरण मधुकर, कृष्ण मोहन प्रसाद समेत अनेक सुधीजन उपस्थित थे। मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।

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