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फ़िल्म समीक्षा: तुम्हारी सुलु

सुरेश त्रिवेणी निर्देशित तुम्हारी सुलु मुंबई के उपनगर विरार की एक घरेलू महिला सुलोचना की कहानी है। सुलोचना के परिवार में पति अशोक और बेटा है। मध्यवर्गीय परिवार की सुलोचना अपने पति और बेटे के साथ थोड़ी बेचैन और थोड़ी खुश रहती है। बिल्डिंग और सोसाइटी में होने वाली प्रतियोगिताओं में वह सेकंड या फर्स्ट आती रहती है। इन प्रतियोगिताओं से ही उसने घर के कुछ उपकरण भी हासिल किए हैं। पति अशोक पत्नी सुलोचना की हर गतिविधि में हिस्सा लेता है। सुलोचना अपनी व्यस्तता के लिए नित नई योजनाएं बनाती है और उनमें असफल होती रहती है। पिता और बड़ी बहनें(जुड़वां) उसका मजाक उड़ाती रहती हैं।मायके के सदस्यों के निशाने पर होने के बावजूद वह हीन भावना से ग्रस्त नहीं है। वह हमेशा कुछ नया करने के उत्साह से भरी रहती है। अशोक भी उसका साथ देता है।

नित नए एडवेंचर की रुटीन प्रक्रिया में वह एक एफएम चैनल में आरजे बनने की कोशिश में सफल हो जाती है। उसे रात में ‘तुम्हारी सुलु’ प्रोग्राम पेश करना है,जिसमें उसे श्रोताओं की फोन इन जिज्ञासाओं के जवाब सेक्सी आवाज़ में देने हैं। शुरू की दिक्कतों के बाद सुलोचना को इस काम में मज़ा आने लगता है और वह अपने सुलु अवतार को एंजॉय करती है। पति अशोक को शुरू में यह सब मजाक लगता है लेकिन सुलोचना की गंभीरता उसे राजी कर लेती है। वह पत्नी के इस नए एडवेंचर में उसके साथ है। उसकी मदद भी करता है। पत्नी के प्रोग्राम को सुनते हुए वह कई बार आम पति की तरह असहज भी होता है । धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बनती है की वह सुलोचना के इस नए जॉब के प्रति सहज नहीं रह पाता।उसकी अपनी नौकरी की दिक्कतें उसके तनाव को और बढ़ा देती हैं। बीच में बेटे को लेकर एक ऐसा प्रसंग आता है कि दोनों एक-दूसरे को उसके लिए दोषी ठहराते हैं। मायके के सदस्य मदद के लिए आते हैं और एक सुर से फैसला करते हैं कि सुलोचना को यह काम छोड़ देना चाहिए। उसे अपने बेटे पर ध्यान देना चाहिए। परिवार के इस दबाव को सुलोचना शिद्दत से ठुकराती है और उनके सामने विरोध के बावजूद दफ्तर के लिए निकल जाती है।

यहीं यह साधारण सी फिल्म बड़ी और जरूरी हो जाती है। सुलोचना अपने इरादे में दृढ़ है।वह परिवार के विरोध का डटकर मुकाबला करती है। स्वतंत्र महिला के रूप में उस का आविष्कार होता है। यहीं सुलोचना उन लाखों-करोड़ों घरेलू महिलाओं की प्रतिनिधि चरित्र बन जाती है जो अपनी जिंदगी की सीमाओं से निकलकर कुछ करना चाहती हैं। स्वतंत्र होना चाहती हैं। स्वतंत्रता पति या परिवार से अलग होने में नहीं है। स्वतंत्रता अपने फैसले पर अडिग रहने की है और इसकी वजह से आई मुश्किलों को संजीदगी से निपटाने में है। ‘तुम्हारी सुलु’ की सुलोचना इस मायने में महिला सशक्तिकरण के प्रभाव में आई फिल्मों से दो कदम आगे निकल जाती है।

विद्या बालन ने सुलोचना के किरदार को अपेक्षित प्रभाव के साथ निभाया है। गौर करें तो विद्या बालन लगातार पिछले कई फिल्मों से ऐसे किरदार निभा रहीं हैं,जो फिल्म के केंद्र में रहती है। विद्या अपनी पीढ़ी की खास अभिनेत्री हैं उन्होंने ‘द डर्टी पिक्चर’ और ‘कहानी’ से अलग राह पकड़ी है। इस राह में वह कुछ फिल्मों के साथ गिरी हैं कुछ के साथ आगे बढ़ी हैं और और यह दिखाया है कि उन्हें सही स्क्रिप्ट और निर्देशन मिले तो वह नए मुकाम हासिल कर सकती हैं। ‘तुम्हारी सुलु’ में उनका व्यक्तित्व निखार कर आया है। इस फिल्म में मानव कौल ने उनके पति की भूमिका निभाते हुए शहरों के उन लाखों पतियों को अभिव्यक्ति दी है जो अपनी पत्नियों के एडवेंचर और प्रयोग में साथ रहते हैं। मानव कौल अशोक की भूमिका में अत्यंत सहज और प्रभावशाली हैं।

अवधि – 140 मिनट
**** चार स्टार
-अजय ब्रह्मात्मज
साभार: चवन्नी चैप

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