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मुसहर थे पटना के मूल निवासी

1907 में पटना जिला के गज़ेटियर तैयार करने के क्रम में ब्रिटिश आईसीएस अधिकारी ओ’ मैली ने यहां रहने वाली जातियों की जनसंख्या के साथ साथ उनके बारे में दिलचस्प जानकारियां दी हैं। पिछले कॉलमों में आपने बड़ी जनसंख्या वाली जातियों के बारे में पढ़ा होगा।

तत्कालीन पटना जिले में अन्य महत्वपूर्ण जातियों के साथ साथ 25000 से ज्यादा आबादी वाली अन्य आठ जातियों में बढ़ई, ब्राह्मण, धानुक, हज्जाम (नाई), कंदुस, मुसहर, पासी और कायस्थ थे।

ओ’ मैली ने लिखा है, ‘जिले में ब्राह्मणों की संख्या41,265 है। ऊँची जाति में शामिल होने के बावजूद इन लोगों ने अंग्रेजी के महत्व को नहीं समझा इसलिए इन्हें सरकार में क्लर्क की नौकरी के लायक नहीं समझा गया। जबकि बौद्धिक रूप से ब्राह्मण उसके योग्य थे। जिले में शाक्यद्विपीय और कान्यकुब्ज, दो प्रकार के ब्राह्मण हैं। शाक्यद्विपियों में कुछ भूस्वामी और किसान हैं लेकिन आमतौर पर ये वैद्य और पुजारी होते हैं। कान्यकुब्जों में ज्यादा संख्या ऐसे लोगों की है जो संस्कृत और हिंदी के शिक्षक हैं। कुछ कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने कृषि का पेशा अपना लिया है। थोड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो छोटे-मोटे जमींदार हैं। इनमें जो गरीब ब्राह्मण हैं वे रसोईए बन गए हैं। कहते हैं कि इन ब्राह्मणों के हाथों बना हुआ खाना सभी खा सकते हैं। एक और ब्राह्मण हैं- सरयूपारी। ये किसी प्रकार का उपहार स्वीकार नहीं करते।’

ब्राह्मणों के बाद संख्या के आधार पर मुसहरों का स्थान आता है। इनकी जनसंख्या 40,791 है। ओ’ मैली ने मुसहरों को पटना जिला का मूल निवासी माना है। ये या तो मजदूरी करते हैं या हलवाहा होते हैं। ओ’ मैली ने लिखा है, ‘ मुसहर बहुत गरीब होते हैं। टूटी फूटी झोपड़ियों में रहते हैं। इन्हें भोजन के रूप में पर्याप्त अनाज नहीं मिल पाता है फलस्वरूप ये सभी प्रकार के जानवरों को खाते हैं। चाहे वह जंगली बिल्ली, चूहे, मेढक और गिलहरी ही क्यों न हो !’

उसके बाद स्थान आता है पासियों का। पूरे जिले में इनकी आबादी है 34,472। पासियों की पूरी आबादी ताड़ के पेड़ों से प्राप्त ताड़ी को बेच कर अपना जीवनयापन करती है। जिन्हें इनसे गुजारा नहीं होता वे मजदूरी करते हैं। कुछ लोगों के पास खेती के लायक जमीन भी है। पासियों की एक खासियत होती है। वे पुरवैया (पूरब दिशा की हवा) की हवा को चढ़ावा चढ़ाते हैं ताकि ताड़ी का मौसम उनके लिए अच्छा हो।

33,296  की आबादी वाले धानुक आमतौर पर तटबंधों पर खुदाई और मजदूरी का काम करने वाले होते हैं। ओ’ मैली ने इनके बारे में लिखा है, ‘स्थानीय तौर पर इन्हें उन कुर्मियों का वंशज माना जाता है जिन्होंने अपने को गुलाम के रूप में बेच दिया है। लेकिन इनके नाम से लगता है कि ये धनुर्धर रहे हैं। धानुक संभवतः गैर आर्य जातियों में से किसी के वंशज है।’

प्राचीन पाटलिपुत्र की खोज करने वाला कर्नल वाडेल अपने खोजों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि पटना सिटी के एक छोटे इलाके में रहने वाले धानुक संभवतः प्राचीन पाटलिपुत्र के लकड़ी की विशाल चारदीवारी की रखवाली करने वाले सैनिकों के वंशज हैं। ये सैनिक प्राचीन काल में किले की निगरानी और हिफाजत में लगे हुए थे।

साभार: प्रभात खबर

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  1. चंचल सिंह

    ज्ञानवर्धक जानकारी। राजपूतों के बारे में भी जानकरी दें।

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