+91 943 029 3163 info@biharkhojkhabar.com
BREAKING NEWS

फिल्‍म समीक्षा: हाफ गर्ल फ्रेंड

शब्‍दों में लिखना और दृश्‍यों में दिखाना दो अलग अभ्‍यास हैं। पन्‍ने से पर्दे पर आ रही कहानियों के साथ संकट या समस्‍या रहती है कि शब्‍दों के दृश्‍यों में बदलते ही कल्‍पना को मूर्त रूप देना होता है। अगर कथा परिवेश और भाषा की जानकारी व पकड़ नहीं हो तो फिल्‍म हाफ-हाफ यानी अधकचर...

फिल्‍म समीक्षा: मेरी प्‍यारी बिंदु

थिएटर से निकलते समय कानों में आवाज आई…फिल्‍म का नाम तो ‘मेरी परायी बिंदु’ होना चाहिए था। बचपन से बिंदु के प्रति आसक्‍त अभिमन्‍यु फिल्‍म के खत्‍म होने तक प्रेमव्‍यूह को नहीं भेद पाता। जिंदगी में आगे बढ़ते और कामयाब होते हुए वह बार-बार बिंदु के पास लौटता है। बिंदु के...

फिल्म समीक्षा: बाहुबली द कन्‍क्‍लूजन

कथा आगे बढ़ती है… राजमाता शिवगामी फैसला लेती हैं कि उनके बेटे भल्‍लाल की जगह अमरेन्‍द्र बाहुबली को राजगद्दी मिलनी चाहिए। इस घोषणा से भल्‍लाल और उनके पिता नाखुश हैं। उनकी साजिशें शुरू हो जाती हैं। राज्‍य के नियम के मुताबिक राजगद्दी पर बैठने के पहले अमरेन्‍द्र बाहुबली कटप्‍पा...

फिल्‍म समीक्षा: नूर

जब फिल्‍म का मुख्‍य किरदार ‘एक्‍शन’ के बजाए ‘नैरेशन’ से खुद के बारे में बताने लगे और वह भी फिल्‍म आरंभ होने के पंद्रह मिनट तक जारी रहे तो फिल्‍म में गड़बड़ी होनी ही है। सुनील सिप्‍पी ने पाकिस्‍तानी पत्रकार और लेखिका सबा इम्तियाज के 2014 में प्रकाशित उपन्‍यास ‘कराची,यू आर कि...

फिल्म समीक्षा: बेगम जान

फिल्‍म की शुरूआत 2016 की दिल्ली से होती है और फिल्‍म की समाप्ति भी उसी दृश्‍य से होती है। लगभग 70 सालों में बहुत कुछ बदलने के बाद भी कुछ-कुछ जस का तस है। खास कर और तों की स्थिति…फिल्‍म में बार-बार बेगम जान औरतों की बात ले आती है। आजादी के बाद भी उनके लिए कुछ नहीं ब...

जीवन को आखिरी क्षणों तक जीना चाहती है नाइन की नायिका

अकादमी ऑफ फ़िल्म एंड टेलीविज़न द्वारा निर्मित शार्ट फ़िल्म का प्रदर्शन ९ अप्रैल की शाम को किया गया। मुख्य रूप से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में प्रदर्शन के लिए निर्मित पूरी तरह बिहार के कलाकारों, निर्देशक एवं तकनीशियन द्वारा बिहार के लोकेशन्स पर बनी 25 मिनट क...

फिल्‍म समीक्षा: मिर्जा़ जूलिएट

जूली शुक्‍ला उर्फ जूलिएट की इस प्रेमकहानी का हीरो रोमियो नहीं,मिर्जा है। रोमियो-जूलिएट की तरह मिर्जा-साहिबा की प्रेम कहानी भी मशहूर रही है। हाल ही में आई ‘मिर्जिया’ में उस प्रेमकहानी की झलक मिली थी। ‘मिर्जा जूलिएट’ में  की जूलिएट में थोड़ी सी सा‍हिबा भी है...

फिल्म समीक्षा: नाम शबाना

नीरज पांडेय निर्देशित ‘बेबी’ में शबाना(तापसी पन्‍नू) ने चंद दृश्‍यों में ही अपनी छोटी भूमिका से सभी को प्रभावित किया था। तब ऐसा लगा था कि नीरज पांडेय ने फिल्‍म को चुस्‍त रखने के चक्‍कर में शबाना के चरित्र विस्‍तार में नहीं गए थे। हिंदी में ‘स्पिन ऑफ’ की यह अनोखी कोशिश है। फिल्...

फिल्म समीक्षा: फिल्‍लौरी

भाई-बहन कर्णेश शर्मा और अनुष्‍का शर्मा की कंपनी ‘क्‍लीन स्‍लेट’ नई और अलग किस्‍म की कोशिश में इस बार ‘फिल्‍लौरी’ लेकर आई है। फिल्‍लौरी की लेखक अन्विता दत्‍त हैं। निर्देशन की बागडोर अंशय लाल ने संभाली है। दो युगों की दो दुनिया की इस फिल्‍म में दो प्रेम कहानियां चलती हैं। पिछले युग...

फिल्‍म समीक्षा: अनारकली ऑफ आरा

21 वीं सदी में आज भी बहू, बेटियां और बहन घरेलू हिंसा, बलात संभोग व एसिड एटैक के घने काले साये में जीने को मजबूर हैं। घर की चारदीवारी हो या स्‍कूल-कॉलेज व दफ्तर चहुंओर ‘मर्दों’ की बेकाबू लिप्‍सा और मनमर्जी औरतों के जिस्‍म को नोच खाने को आतुर रहती है। ऐसी फितरत वाले बिहार के आरा से...