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क़यास कीजिए

क़यास कीजिए कि आप नालंदा से पाटलिपुत्रा की दूरी सड़क-मार्ग से तय कर रहे हैं। शाम के साढ़े पांच-छह बज रहे हैं। दिन-भर की तपिश हल्की हो चली है, धूल के कण सड़क की दोनों ओर फैले सूखे, बंजर-जैसे खेतों पर फैल गए हैं। क़यास यह भी कीजिए कि डेढ़-दो घंटे का यह सफ़र आप अपनी कार से तय कर रहे ...

बनारस में एक दिन

आनन्दजी ने बहुत प्रयास किया, किन्तु किसी भी गेस्ट हाउस में वे मेरे लिए कमरा तलाश नहीं कर सके। शायद देशी होने का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा। हम जहां भी जाते रिशेप्सन पर खड़ा व्यक्ति मुझे देख गरदन हिला देता-नहीं जगह नहीं है। उन्हें विदेशियों से फुरसत नहीं थी। सचमुच गंगा कि...

नालन्दा : पत्थर और बहता समय

मंदिर में बज रहे घंटे की आवाज ने नींद से जगाया। सुबह की धूप बगल की खुली खिड़की से कूदकर, बिस्तर पर फैल गयी थी। मैं कहां हूं-यकायक समझ नहीं पाता हूं। सहसा नजरें खिड़की के पार, पेड़ों के पीछे खंडहरों पर पड़ती है-और अचानक सब कुछ याद हो आता है-ये नालन्दा के खंडहर हैं...

गंगा ने पूछा था, मैं अपना पाप कहां धोऊंगी?

श्मशान ठीक गंगा तट पर था। जितना बड़ा उतना ही डरावना। दूर-दूर तक बस्ती का निशान नहीं था। चारों ओर बालू का अखंड, कहीं-कहीं खजूर के एक-दो पेड़ या कंटीली झाड़ियां, यही कुछ वहां दिखाई देता था। श्मशान के बीचों-बीच एक झोंपड़ा था। आंधी-पानी आने पर या किसी कारण विश्राम करने की आवश्यकता हो ...

समृद्ध अतीत, उदास वर्तमान

सचेपि मे अभ्य पुत्त! वेसालि साहांर दस्सथ एंवमहं तं मत्तं न दस्सामीति। (आर्य पुत्रों! यदि वैशाली का जनपद भी आप हमें दें, तो भी मैं इस महान भात को नहीं दूंगी-अंबपाली) -महापरिनिर्वाण सूत्रा 50 चारों ओर एक घना-सा सन्नाटा घिर आया था- कभी-कभी हवा के झोंके से पत्ते खड़खड़ा उठते...