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संवेदना के दर्द का खतियान है ‘माटी माटी अरकाटी’

आदिवासी क्षेत्र झारखंड के वासियों के कैरिबियन क्षेत्र में हिलकुली के नाम से पहचान बनाने वाले मजदूरों के जीवन और संघर्ष का दस्तावेजीकरण नहीं कलाकरण है श्री अश्वनी कुमार पंकज का पहला उपन्यास ‘माटी माटी अरकाटी’। इस रूप में यह एक केंद्रित और साभिप्राय लिखा गया विसंरचनावादी उ...

प्रकृति, मनुष्यता और आध्यात्मिक, राजनीतिक पतनशीलता की कविताएं

डाॅ. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’ की 76 कविताओं का संकलन ‘गहरी स्मृति के दाग’ उनका चौथा काव्य संग्रह है। अपनी इसी संग्रह की एक कविता ‘प्याज और मजदूर’ में कवि सवाल उठाता है, ‘प्रजातंत्र क्या सिर्फ/मतदान के लिए है?’ (पृष्ठ-41) इसी कविता में कवि प्याज के बहाने वर्तमान सियासी चरित्र की भी टोह...

समीक्षा: आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग को ढूँढ़ने का नया तरीक़ा

मेरा मानना है कि हर लेखक किसी पहाड़ी कबीले का सदस्य होता है। तभी तो हर लेखक जीवन को, जीवन से जुड़े संघर्ष को इतने निकट से देख पाता है। यह सही भी है। एक सच्चे लेखक का जीवन क्या है, कैसा है, कैसा होना चाहिए जैसे सवाल जब कभी मेरे भीतर उठे हैं, तो मुझे उत्तर यही मिलता रहा है कि हर लेखक...

समीक्षाः कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग

जीवन के अंत में ही मुक्तिबोध का एक ढ़ीला-ढ़ाला कविता-संग्रह आया। उनकी एक कविता को पाठ्यक्रम से हटाया गया। मेरे खुद का एकांकी एकत्र संग्रह 78वें वर्ष में आया-रीढ़। प्रभात सरसिज 66वें वर्ष में अपना पहला संग्रह दे सके। ऐसे उदाहरण कम हैं जिससे शब्दों से प्रशिक्षण देने का पता चले। कवि...

समीक्षा: फारवर्ड प्रेस पत्रिका का साहित्य वार्षिकी

सात को समापन का अंक माना जाता है. बाईबिल के अनुसार, सृष्टि निर्माण के छठवें दिन, मानव का सृजन करने के पश्चात, ईश्वर ने ‘विश्राम’ किया. ऐसा नहीं था कि ईश्वर को आराम की जरुरत थी वरन उसने इसलिए ऐसा किया ताकि वह हमें यह सीख दे सके कि छह दिन मेहनत करने के पश्चात, हमें भी अपने शरीर ...

दिल्ली में उर्दू पत्रकारिता

हाल में, बिहार के ही एक चर्चित उर्दू पत्रकार, शाहिदुल इस्लाम, ने उर्दू सहाफ़त (पत्रकारिता) को लेकर एक गंभीर, शोधपरक किताब लिखी है। शीर्षक है ‘दिल्ली में असरी उर्दू सहाफ़त‘, यानी दिल्ली की समकालीन उर्दू पत्रकारिता। एक उप-शीर्षक भी है इस किताब का:‘तस्वीर का दूस...

समय की निराशा को दूर करने और मनुष्य की शून्यता को भरने की ज़िद

‘रेत पर लिखी इबारतें’ और ‘कोलाहल में शब्दों की लय’ समकालीन भारतीय साहित्य के सर्वाधिक चर्चित साहित्यकारों में एक जाबिर हुसेन के रचना-कर्म का, दो खंडों में समाहित, सुविचारित और क़लम की अनमोल ताक़त का एहसास कराते देश भर के प्रतिष्ठित रचनाकर्मियों के लेखो...

वर्तमान विकास में मुक्ति का प्रश्न

समाजवादी विचारकों में सच्चिदानंद सिन्हा अग्रणी रहे हैं, जिनके विचार बहस को उकसाते हैं। उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं और कई अवधारणाओं के जन्मदाता भी रहे हैं। उनके पहले आन्तरिक उपनिवेश की अवधारणा उतनी जोर नहीं पकड़ी थी, उतनी सर्वमान्य नहीं हुई थी, जितनी कि आज है। आज भारतीय पूँजीवाद...

पुस्तक समीक्षा: स्मृतियों के स्वर्णिम दिन

‘स्मृतियों के स्वर्णिम दिन’ कवि सुशील राकेश की वह साहित्यिक यात्रा है जिसमें उन्होंने साहित्य व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया, प्रेरणा, प्रोत्साहन, साहित्यिक सृजनशीलता, साहित्यिक प्रतिबद्धता और अपनी पक्षधरता को पाठकों के सामने बहुत ही सरल, सहज और स्वतंत्र लेखन के साथ ...

स्त्री विमर्श की ‘निरंजना’

बिहार के जाने माने आलोचक डाॅ. खगेन्द्र ठाकुर अपने एक संस्मरण में कहते हैं कि सन् 1959 में एक मित्र के सहयोग से उन्होने एक पत्रिका ‘सीमांत’ प्रकाशित की और उसके प्रवेषांक की प्रति लेकर आचार्य नलिन विलोचन शर्मा के पास गये। आचार्य श्री ने उभय युवा लेखकों के संयुक्त उत्साह और श्रम ...
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