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समय सजग कवि हैं विनय: रविभूषण

माॅल में कबूतर भारतीय भाषाओं में संभवतः अकेली पुस्तक होगी जिसकी सभी कविताएं बाजार केंद्रित हैं। संग्रह की 38 कविताओं में से 15 में माॅल की चर्चा है। माॅल आखिर है क्या और बाजार आखिर है क्या? बाजार पहले बाजार में था अब बाजार में नहीं है। वह टीवी एड के जरिए बेडरूम में आया, ...

दूसरा शनिवार में युवा शायर अविनाश अमन की गजलें

किसी शहर की गतिशीलता मापनी हो तो उसका एक रास्ता अदब की दुनिया में शेरों शायरी से होकर भी गुजरता है। पटना शहर की बात करें तो इस तरह की गतिशीलता को बनाए रखने में यहां के कुछ युवा साथियों की पहल पर ‘दूसरा शनिवार’ नामक कार्यक्रम ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। हर महीने की दूसरी शनिव...

नई चेतना की शुरुआत साहित्यकार ही करते हैंः शैवाल

‘खूंटे में बंधा आदमी’ शीर्षक पुस्तक ने मुझे प्रेरित किया। जिस परिस्थिति में राजनीति में मैं आया था उस समय की परिस्थितियों से मिलता-जुलता है इन कहानियों का परिवेश। 50-60 के दशक में दुनिया भर के देशों में लोगों का जीवन स्तर बहुत निम्न स्तर का था, दूभर था। आज लोगों मे...

अपने गुलाम पर फ़िदा था अलाउद्दीन खिलजी, बधिया कराकर बना लिया प्रेमी

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती ने एक बार फिर अल्लाउद्दीन खिलजी को सुर्ख़ियों में ला दिया है। दिल्ली सल्तनत के दूसरे शासक अल्लाउद्दीन खिलजी ने 1296 से 1316 तक दिल्ली पर हुकूमत किया था। इतिहास में खिलजी का चाहे जो भी स्थान हो लेकिन साहित्य में खिलजी एक क्रूर खलनायक है जो राजप...

एक दोपहर ‘बज़्म-ए-सुख़न’ के नाम

इक ज़रा सी सुख़न-फ़हमी अगर दे दे ख़ुदा, ज़िन्दगी का लुत्फ़ ग़ालिब की तरफ़दारी में है! तो ले चलते हैं आपको ज़िन्दगी के लुत्फ़ और ग़ालिब की तरफ़दारी के लिए लेख्य-मंजूषा की प्रस्तुति “बज़्म-ए-सुख़न” में, जिसकी सदारत मशहूर शायर जनाब क़ासिम ख़ुर्शीद साहब  और निजामत जनाब अस्तित्व अंकुर ...

संवेदना के दर्द का खतियान है ‘माटी माटी अरकाटी’

आदिवासी क्षेत्र झारखंड के वासियों के कैरिबियन क्षेत्र में हिलकुली के नाम से पहचान बनाने वाले मजदूरों के जीवन और संघर्ष का दस्तावेजीकरण नहीं कलाकरण है श्री अश्वनी कुमार पंकज का पहला उपन्यास ‘माटी माटी अरकाटी’। इस रूप में यह एक केंद्रित और साभिप्राय लिखा गया विसंरचनावादी उ...

मैंने किसी दल की पालकी नहीं उठाईः मधुकर गंगाधर

‘मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की त्रिभुज ने एक दौर में हिंदी कहानी को कैद कर लिया था उससे हम मुक्त हुए, लेकिन पुनः नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह और कशीनाथ सिंह की चतुर्भुज की कैद में आ गए। यह दुभाग्यपूर्ण है कि हिंदी को बनाने में जिस बिहार का बड़ा योगदान रह...

समीक्षा: आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग को ढूँढ़ने का नया तरीक़ा

मेरा मानना है कि हर लेखक किसी पहाड़ी कबीले का सदस्य होता है। तभी तो हर लेखक जीवन को, जीवन से जुड़े संघर्ष को इतने निकट से देख पाता है। यह सही भी है। एक सच्चे लेखक का जीवन क्या है, कैसा है, कैसा होना चाहिए जैसे सवाल जब कभी मेरे भीतर उठे हैं, तो मुझे उत्तर यही मिलता रहा है कि हर लेखक...

सामाजिक सौन्दर्य चेतना को महत्व देने वाले आलोचक थे नलिन जी: गोपेश्वर सिंह

‘नलिन जी अध्यापक होने के बावजूद सर्जक थे इसलिए सर्जक आलोचक थे। कविता और कहानी-इन दोनों ही विधा के वे बड़े रचनाकार थे। उपन्यास भी लिखना चाहा, लिख नहीं पाए। कई अर्थ में वे असामान्य थे, सब काम उनके ढंग के होते थे। टैगोर का प्रसिद्ध गीत है कोई तुम्हारी आवाज नहीं सुने तो अक...

आजाद मनुष्य की खोज ही साहित्य का लक्ष्यः मणि

‘दीर्घ नारायण नवोदित कथाकार हैं, लेकिन जिस लेखक के दो कथा संग्रह आ चुके हों वह तो स्थापित कथाकार हो जाता है। मैंने ‘पहला रिश्ता’ संग्रह की कहानियां पढ़ी है। इनसे सचमुच प्रभावित हुआ।’ ये बातें पूर्व एम.एल.सी एवं वरिष्ठ लेखक प्रेमकुमार मणि ने दीर्घ नारायण के कथा संग्रह ‘पहला रिश्ता’...