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पटना के इंदिरा गांधी ह्रदय रोग संस्थान के निर्माण की रोचक कहानी

पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के परिसर में मौजूद इंदिरा गांधी ह्रदय रोग संस्थान देश के महत्वपूर्ण चिकित्सा संस्थान के रूप में स्थापित हो चुका है। अपने स्थापना काल से लेकर अबतक इसने लाखों ह्रदय रोग के मरीजों को नई जिंदगी दी है।

इंदिरा गांधी ह्रदय रोग संस्थान के स्थापना की कहानी बहुत ही रोचक है। पिछली सदी के छठे दशक में प्रख्यात ह्रदय रोग विशेषज्ञ स्वर्गीय डॉक्टर श्रीनिवास ने अपनी नौकरी को खतरे में डालते हुए इसकी स्थापना की थी। उन दिनों तक ह्रदय रोग के मरीजों के लिए अलग से कोई हॉस्पिटल नहीं था, न ही कोई वार्ड। उनका ईलाज जेनरल वार्ड में ही किया जाता था।

डॉक्टर श्रीनिवास कार्डियोलॉजी में विशेषज्ञता हासिल कर सात वर्षों के बाद पटना लौटे थे। पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में उनकी नियुक्ति मेडिसिन विभाग में प्रमुख के तौर पर हुई थी। एक बातचीत में उन्होंने बताया था, ‘ ‘ईलाज के क्रम में मैंने देखा कि ह्रदय रोग के मरीजों के लिए अलग से कोई व्यवस्था नही थी। डॉक्टरों से उन्हें जो ईलाज मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पा रहा था। ऐसे में मैंने सोचा कि सात वर्षों तक मैंने जो पढाई की है, उसका क्या मतलब होगा।’

जिस भवन में अभी इंदिरा गांधी ह्रदय रोग संस्थान है, उन दिनों वह खाली पड़ा हुआ था। उसमें इन्फेक्शस डिजीज के अस्पताल खोलने की बात चल रही थी। डॉक्टर श्रीनिवास ने कहा था, ‘इन्फेक्शस डिजीज का अस्पताल भी जरूरी था। लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी था ह्रदय रोग का अस्पताल। एक दिन रात में जोखिम लेते हुए मैंने ह्रदय रोग के सात- आठ रोगियों को उस वीरान पड़े भवन में शिफ्ट कर दिया।’

‘अगले दिन सुबह आठ बजते – बजते चारों तरफ हंगामा हो गया। अरे ! डॉक्टर साहब ने तो सरकार का अस्पताल ही हड़प लिया है। ऐसा कभी हुआ क्या ? वे तो मरीज भी चुरा कर ले गए। जबर्दस्ती किया। जितनी भी शिकायत हो सकती थी, की जाने लगी।

9 बजे हॉस्पिटल सुपरिन्टेन्डेन्ट आये। मुझे बुला भेजा। मुझे देखते ही कहा- आपने तो गजब कर दिया। आपने तो मकान ही कब्जे में कर लिया। डिसिप्लिन ही तोड़ दिया। जाइये डायरेक्टर हेल्थ सर्विसेस ने आपको बुलाया है।

डरते – डरते मैं सचिवालय में डायरेक्टर हेल्थ सर्विसेस के कार्यालय में गया। उन दिनों डॉक्टर कर्नल बी. सी. नाथ डायरेक्टर हुआ करते थे। एकदम कड़क। मुझे देखते ही कहा- ‘क्यों डॉक्टर श्रीनिवास ! आपको सरकार की नौकरी करनी है या नहीं ? मैंने कहा – ऐसा तो मैंने कभी नहीं कहा है कि मुझे नौकरी नहीं करनी है। तब उन्होंने कहा , ‘आपने जो हरकत की है उससे मैं हैरान हूँ। आपने तो मकान ही हड़प लिया। उस हॉस्पिटल में तो न कोई नर्स है, न कोई वार्ड अटेंडेंट ही। कोई सुविधा भी नहीं है। ऐसे में आपने हृदय रोग के मरीजों को वहां ले जा कर रख दिया। क्या यह उचित है ? उन्होंने मुझसे पूछा।

तब मैंने विनम्रता के साथ उनसे कहा, ‘अगर आप की अनुमति हो तो मैं आप से कुछ कहूं।’ उन्होंने अनुमति दी। ‘ मैंने कहा, ‘ मुझे सात वर्षों तक दुनियां के बड़े -बड़े डॉक्टरों के साथ काम करने का अवसर मिला। हृदय रोग में मैंने विशेषज्ञता हासिल की। अब यहाँ आकर अस्पताल में देखता हूं कि हृदय रोग के मरीजों का ठीक से ईलाज नहीं हो पा रहा है। उन्हें जेनरल वार्ड में रखा जा रहा है। तो मुझे लगता है कि मैंने जो ट्रेनिंग पाई है, वह व्यर्थ जा रहा है।’ सुनकर उन्होंने कहा, ठीक है -आप जाइये। मैंने राहत की सांस ली।

अगले दिन जब मैं उस भवन में गया तो देख कर आश्चर्यचकित रह गया कि वहां नर्स भी थीं, वार्ड अटेंडेंट भी थे और सफाई करने वाले भी। पता चला कि डॉक्टर कर्नल नाथ ने फोन कर इस नए अस्पताल में जो भी जरूरी हो सकता था, करने के लिए कहा।

मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मेरा प्रयास सार्थक रहा। अब हॉस्पिटल तो बन गया था। लेकिन ईलाज के लिए जितने संसाधन चाहिए थे, उसका घोर आभाव था। फण्ड की कमी थी। तब मैं दिल्ली गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने की अनुमति ली। उस वक्त तक देश में कार्डियोलॉजी का अलग से कोई अस्पताल नहीं था। मैंने प्रधानमंत्री से कहा कि मैं चाहता हूं कि देश के पहले हार्ट हॉस्पिटल का नाम आपके नाम पर हो। उन्होंने सहमति दे दी। तो मैंने कहा कि जिस हॉस्पिटल का नाम आप के नाम पर हो तो क्या आप नहीं चाहेंगी कि वह ग्रो करे ? तब उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे देखा और पूछा – कितना पैसे चाहिए ? मैंने कहा – दस करोड़।

इस तरह से डॉक्टर श्रीनिवास ने एक छोटी सी शुरुआत की थी। आज यह संस्थान देश के सर्वोत्तम संस्थानों में से एक है।

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